yunhi dil se

सोच बदलने से ही समाज बदलेगा‏

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drneelammahendra


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क्यों न फिर से निर्भर हो जाए

Posted On: 7 Jun, 2017  
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विरोध का गिरता स्तर गोवध

Posted On: 1 Jun, 2017  
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सुख की खोज में हमारी खुशी कंहीं खो गई

Posted On: 1 Apr, 2017  
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नवसंवत्सर एक नये सफर की शुरूआत

Posted On: 27 Mar, 2017  
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असाधारण चुनाव के असाधारण नतीजे

Posted On: 22 Mar, 2017  
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यह कैसी पढ़ाई है और ये कौन से छात्र हैं

Posted On: 1 Mar, 2017  
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पुलिस की छवि बदलता एक अफसर

Posted On: 16 Feb, 2017  
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क्या यह पूरा न्याय है

Posted On: 15 Feb, 2017  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

जय श्री राम आदरणीया डॉ नीलम जी सुन्दर लेख पर लगता है बेईमानी भ्रष्टाचार और काम चोरी भारतीयों की पहचान बन गयी है बैंक अधिकारी शुरू से बेईमान है जो ऊंचे पदों पर है कोइ लोन बिना कमीशन के नहीं पास करते हाँ ईमानदार और कर्तव्यनिस्ठो की भी कमी नहीं लेकिन हम लोग जब काम करते जब डंडा सर पर हो इस बेइमानी के लिए कांग्रेस सरकार जिम्मेदार है जिन्होंने अब तक कोइ बेईमानी के खिलाफ कार्यवाही नहीं की लेकिन इस बार ज़रूर होगी ये हो सकते कुछ बाख जाए लेकिन जो पकडे जायेंगे उनको देख कर बाकी ऐसा करने के पहले १०० बार सोचेंगे.उम्मीद है कुछ फर्क जरूर पड़ेगा.भौतिकतावाद ने हमलोगों को इस रास्ते पर ला दिया हम अपनी संस्कृत भूल गए सबसे बड़ा रुपैया ही रह गया.भगवान से भी नहीं डरते.

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

आपके विचार, विश्लेषण एवं मूल्यांकन सभी सटीक हैं और तर्कों एवं तथ्यों की कसौटी पर खरे उतरते हैं । मुलायम सिंह यादव ने माला चाहे समाजवाद की जपी हो, राजनीति उन्होंने आजीवन अवसरवाद, परिवारवाद एवं जातिवाद की ही की है । उनसे बड़ा अवसरवादी वर्तमान में सक्रिय भारतीय राजनेताओं में कोई और नहीं है । अखिलेश अपने पिता के विपरीत एक सुशिक्षित, संस्कारी और सुलझे हुए युवा हैं जो जातिवादी राजनीति में नहीं, वरन जनता के हितों एवं अपेक्षाओं के अनुरूप सार्थक कार्य करने में विश्वास रखते हैं । यही बात मुलायम सिंह की दोषपूर्ण राजनीति शैली के अनुकूल नहीं है । इस समय मुलायम सिंह अपने कार्यकलापों से अपने ही दल को सर्वनाश के पथ पर अग्रसर कर रहे हैं और द्वापर युग में आपसी फूट से हुए यादव वंश के विनाश का स्मरण करवा रहे हैं । 'विनाशकाले विपरीत बुद्धि' इस समय उन पर पूरी तरह चरितार्थ हो रही है । वे भूल रहे हैं कि स्वयं उनके नेतृत्व में समाजवादी दल को कभी भी विधानसभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिला था जबकि अखिलेश की स्वच्छ छवि ने प्रथम बार इस दल के सम्पूर्ण बहुमत के साथ सत्तारूढ़ होने में प्रमुख भूमिका निभाई थी । ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे, मैं तो यही प्रार्थना करता हूँ । जहाँ तक अखिलेश का सवाल है, उनके लिए फ़ैसले की घड़ी आ गई है । वे चाहें तो वही कर सकते हैं जो श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने 1969 में कांग्रेस के सिंडीकेट को ठोकर मारते हुए दल का विभाजन करके और अपना पृथक मार्ग चुनकर किया था । संभवतः वर्तमान परिस्थिति में यही उनके लिए सर्वोपयुक्त होगा ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

जय श्री राम डॉ नीलम जी आपने जो लिख व बहुत ही दुख्दही,पीड़ादायक और शर्मनाक है ऐसा हाल देश में सब जगह हो रहा कानपूर में भी ऐसी घटनाओं के समाचार रोज़ आते पता नहीं क्यों डाक्टरों में जिनको देवदूत या ईश्वर मन जाता था इस तरह का लालच आ गया दिल्ली में पढ़ा था की एक मरीज से २५ रु म्मांगे ग्गाये गरीब था इसलिए नहीं दे पाया उसे भरती नहीं किया और मर गया.रोज ऐसे केसेस सुनने को मिलते आज कल निजी हस्पतालो में फीस कितनी है कहा नहीं जा सकता ये सब पिछले ७० सालो की अव्यवस्था का परिणाम है राजनेताओ को जनता से नहीं कुर्सी से प्यार.हम खुद ही गलत ऑपरेशन के शिकार जिससे हम २१ साल से बीएड पर ही है और कितना दुःख उठाया !मोदी सरकार कर रही लेकिन जब तक प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं करेंगे कुछ नहीं हो सकता सुन्दत पोस्ट के लिए आभार.

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

के द्वारा: drneelammahendra drneelammahendra

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समाज में बदलाव भाषणों से नहीं जमीनी स्तर पर काम करने से आता है।।पानी से ही धरती का पेट भरता हैं जिस दिन हम उसका पेट भरने के उपाय खोज लेंगे हमारी नदियाँ हमारे खेत सब भर जाँएगे ।हम धरती को जितना देते हैं वह उसे कई गुना कर के लौटाती है इस बात को उस किसान से बेहतर कौन समझ सकता है जो कुछ बीज बोकर कई गुना फसल काटता है।जब हम धरती का ख्याल नहीं रखेंगे तो धरती हमारा ख्याल कैसे रखेगी? आदरणीया डॉ. महेंद्र, आपने बड़े शोध के साथ इस आलेख को प्रस्तुत किया है. यह बहुत ही लाभकारी साबित हो सकता है बशर्ते की इसे अमल में लाया जाय! आपने अधिक से अधिक हिंदी शब्दों का प्रयोग किया है जिससे लेख में रोचकता और सरसता भी है. बहरहाल आपको मिले साप्ताहिक सम्मान की बधाई! आपके इस आलेख पर कई प्रतिक्रियाएं पडी है एक बार धन्यवाद ज्ञापन तो करना ही चाहिए न! आखिर हम लेख पाठकों के लिए ही लिखते हैं न!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा:




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